Wednesday, November 5, 2014

ऐसे ही


सुबह से ही आज एक अजीब सी ख़ुशी है, वैसे तो खालीपन सा है आजकल, शायद उसके चले जाने का गम है लेकिन जब आत्मविवेचन करता  हूँ तो अपने को ही गुनहगार पता हूँ
सही भी है, उसकी यादों का  भगोड़ा अपराधी जो हूँ, कभी कभी चीज़ों का बिखर जाना अछा और सुकून देता है,  जीवन में क्या क्या पा लिया था एहसास होता है, और जब चीज़ें हाथ में रेत की तरह फिसलती हैं तो एक अजीब सी तिस होती है, 
खैर जब अपने गुनाहों का बोध होता है तो गम कुछ काम हो जाता है, सच ही है, पछतावा काफी कुछ सीखा देता है, 
पेशे से हूँ तो एक इंजीनियर लेकिन दिल से एक लेखक और कवि हूँ, सच पूछिये तो लिखना उसी को देख कर आया, अपने जीवन की जो कुछ बेहतरीन नज़्में है वो उसी के लिए लिखी हैं, आज ३ महीने होने आये कुछ नहीं लिखा, एक खली पण सा दे गयी वो, ऐसा लगता है मनो जीवन की नायिका ही मर चुकी है. 

हमेशा से कहती थी, आप अजीब और बहुत अच्छे इंसान है, माता जी भी यही कहती थी, माताजी के कहने का कभी कोई असर नहीं पड़ा लेकिन अब जब वो जा रही है, एहसास होता है की कितना अजीब हूँ, अच्छा हूँ या नहीं वो शायद वही बता पाये, 
अंतिम मुलाकात हुई दिवाली की दूसरी रोज़, ऐसा लग रहा था जैसे बस वक़्त थम जाये और महसूस करता रहूँ, कहने को तो १० मं समय लेके आई थी, लग रहा था जैसे चीज़ों से भाग रही है, लेकिन जब चीज़ें दिल से जुडी होती हैं तो उनसे भागना उतना ही मुस्किल होता है, १० मं का वो समय एक घंटे २५ मं में कब बदल गया पता ही नहीं चला,
हाँ तो मैं गुनहगार हूँ, अंतर मन में झाँका तो पाया की हूँ भी और बदल भी नहीं सकता, बस यही बताना था उसको, और यह भी की, अपने इस ऐब के अंदर भी शिद्दत से मुहब्बत की है, था मैं थोड़ा अजीब, गलतियों से भरा इंसान और उसकी एहमियत सिर्फ ये नहीं थी की मुहब्बत थी उससे बल्कि इसलिए भी थी की उसने जीवन का वो पहलु से रूबरू कराया जो शायद उसके न आने से नहीं देख पता, 

आप दुनिया में सबके सामने एक महान, बलवान आदमी हो सकते हैं लेकिन जिससे दिल के रिश्ते होते हैं उनके सामने आपको ये सब भूलना पड़ेगा, भावनाओं का भी यही है, जो महसूस करते हैं है उसको दिखने में हर्ज़ ही क्या है? आखिर भावनाएं भी उसी क लिए हैं न. 

ये तो नहीं जनता की किस्मत में क्या है, लेकिन उसके जाने से एक खलीपन सा घर कर गया है जीवन में, उसकी नादानी, बच्चों सी हरकत सब जैसे एक सिनेमा के दृश्य जैसे आँखों के सामने आज भी वही रंगीनियाँ लिए हैं, यूँ तो साल भर पुरानी बात है लेकिन मनो लगता है जैसे अभी कुछ मिनटों पहले की बात हो 

"आप मुझसे नाराज़ तो नहीं हैं न" ..... से ...... "अपना ख्याल रखियेगा"  तक का सफर सचमुच बहुत ही डरावना है और लगता है जैसे मैं आज भी बच्चों से ज़िद और बच्चों सा डरता हूँ :) 

~~ अजेय 

मैं, तुम और हम

26 मई की कुछ भूली बिसरी याद 


जीवन से लड़ते-लड़ते
बीत चुके हैं कई दिन महीने साल
जीवन के इस कुरक्षेत्र में लड़ते लड़ते
खत्म हो चुके हैं मेरे तरकश के तीर
टूट चुकी है मेरी तलवार
टूट चूका है कवच
अपना अंतिम प्रहार भी कर चूका मैं
नयनो से अश्रु और देह से रक्त की धार निकल रही है
,अभिमन्यु की मानिंद उठा लिया है पहिया
इस समर का चक्रव्यूह भेदने
और अंजाम सोचे बिना कूद पड़ा हूँ रण में
इन सबके बीच सोचता हूँ की
कहाँ है वो कृष्ण जिसने मुझे
बिना कुछ सोचे समझे युद्ध में कूद जाने की सलाह दी थी
आत्मविवेचन किया तो पाया की कोई कृष्ण
तो था ही नहीं वो बस “मैं” और “तुम” को “हम” बनाने की चाह में
सबकुछ हारता हुआ देख रहा हूँ
और बारिश में सिगरेट हाथ में लिए
शून्यता में रमे आकाश को निहारते हुए
मैं खोजता हूँ खुद को
अकेले इस जीवन को
अपने समूचे अस्तित्व को खोते हुए
तुम्हारे बिना जीते हुए
~~ अभिषेक तिवारी ‘ अजेय ‘

कब वो जाहिर होगा

(उसके लिए जो कभी कुछ नहीं कहती ☺)


कब वो जाहिर होगा और हैरान करेगा मुझे
सारी मुश्किलों से आजाद कर देगा मुझे
जान फुकेगा वो मुहब्बत के जिस्म में मेरे
अपने सामने बेजान कर देगा मुझे
एक नामौजूदगी रह जायेगी चारों तरफ
घीरे घीरे इस कदर सुनसान कर देगा मुझे
बिन कुछ कहे सब कह जायेगा
इस तरह बे पीर कर जायेगा मुझे
छूट जायेंगी उसकी यादों की चाकरी मुझसे
किसी दिन अफ़सर-ए-खास कर जायेगा मुझे
खिलेंगे तब मुहब्बत के फूल गुलशन में
देखते ही देखते वीरान कर जायेगा मुझे
पीर = आवाज़
चाकरी = नौकर जैसे काम करना
~~ अभिषेक तिवारी ‘अजेय’

जीवन को एक नया आयाम देती हो तुम....

अंधकार में जैसे जला हो कोई दीपक
और उसके इर्द गिर्द करवट बदलता अँधेरा
अपने नए अस्तित्व को पहचानता
अपना सर्वस्व त्याग कर
एक नयी अनुभूति करता
वैसे ही है तुम्हारे बाँहों का घेरा
जिसके दायरे में आके मुस्कुरा उठता है
दुनिया में सबसे उदास जीवन मेरा
नए आयाम मिलते हैं जीवन को मेरे
लगता है जैसे दुःख, दुःख नहीं रहे अब मेरे
एक नया एहसास कराती हो तुम
तुमने नहीं जाना, सहसा मुझमे कितनी उत्तर गयी हो तुम
कोई सुन्दर सा अभिशाप जैसे वर लिया
हाँ !! सच है
मेरे जीवन को है तुमने एक नया नाम दिया
ये कलम, जो पहले शांत थी
इसको पकड़ कर अब लिखना भी सिख लिया
हर पल एक नया एहसास कराती हो तुम
मुझमे एक नव चेतना जागती हो तुम
~~ अभिषेक तिवारी ‘ अजेय ‘

क्रांति के गीत गाना चाहता हूँ

एक कविता लोकनायक श्री जय प्रकाश नारायण, शहीद भगत सिंह को समर्पित

कर्णधार बन हाथ में लगाम लेना चाहता हूँ
क्रांति के गीत गाना चाहता हूँ
भेद सर उठा रहा
मनुष्य को मिटा रहा
दे बदल नसीब, गरीब का सलाम लूँ
अपने जीवन को त्याग का एक नाम देना चाहता हूँ
क्रांति के गीत गाना चाहता हूँ
स्वतन्त्रता ये नहीं की एक तो अमीर हो
दूसरा मनुष्य तो रहे मगर फ़क़ीर हो
वर्ग की तन तानी बढ़ रही
लगता जैसे मुझको पुकार रही
अन्याय का बस एक और इशारा चाहता हूँ
क्रांति के गीत गाना चाहता हूँ
चाहते थक कर सब कमरे का एक शांत कोना
अब न सेह सकेगी वृद्धा भूमि सब का भार ढोना
न्याय के इस आगाज़ को चिंगारी देना चाहता हूँ
जीर्ण जग में फिर से नयी दुनिया बसाना चाहता हूँ
क्रांति के गीत गाना चाहता हूँ
सबमे है एक अर्जुन
पर रण से डरते हैं सब
लेकिन इस अन्याय के विरुद्ध एक और महाभारत होना जरुरी है
केशव के आवाज़ बन
हर एक अर्जुन को जगाऊँ
ऐसा एक स्वर बनना चाहता हूँ
क्रांति के गीत गाना चाहता हूँ
मंद गति से बहने वाली
अदृश्य हो पास ही रहती
जनता के दुःख है जैसे हवा
मंद हवा को गर्म सांसों में बदलना होगा
अदृश्य इस हवा को बवंडर बनाना चाहता हूँ
क्रांति के गीत गाना चाहता हूँ
छा गया ताम का अँधेरा
मनुष्य ही मनुष्य को डरा रहा
अन्याय का अँधेरा अब छाँटना चाहिए
इस अँधेरे में प्रकाश का एक दीप बनना चाहता हूँ
सूरज जो छांट दे इस अँधेरे को वो सूरज बनना चाहता हूँ
क्रांति के गीत गाना चाहता हूँ
चाहता हूँ बांधना गतिविधि समय की
भुलाना चाहता हूँ चिंता प्रलय की
आग पानी में लगाना चाहता हूँ
क्रान्ति के गीत गाना चाहता हूँ
व्यंग्य करता है मुझ पर अब मनुजता पर मनुज का ये छुद्र जीवन
हँस रहा मुझ पर जवानी की उमंगों का लड़कपन
जवानी के इस जोश में किसी ने कहा था -
“सत्ता के बहरों को क्रांति के विस्फोट सुनना चाहता हूँ..
इंक़लाब के नारे लगा के क्रांति के गीत गाना चाहता हूँ
हाँ मैं भगत सिंह हूँ क्रांति के गीत गाना चाहता हूँ “
देश लज्जित हो रहा देख के इस नरक की लखर विषमता
आज सुख भी रो रहा देख कर दुःख की विवशता
रोती जनता को देख कर किसी ने कहा था तब -
“इंदिरा का आसान डगमगाना चाहता हूँ.…
आने वाली जनता के लिए सिंहासन खली करना चाहता हूँ..
जनता के अवसादों की कहानी सुन्ना और समझना चाहता हूँ
हाँ मैं JP हूँ, क्रांति के गीत गाना चाहता हूँ
~~ अभिषेक तिवारी ‘ अजेय ‘

ज़िद्दी लड़के- 1

अरसा बीत गया सुने आम की सबसे निचली डाली पर बैठी कोयल की कूक,
जान बूझकर चलता रहा नाक की सीध में,
जैसे कुछ न देखने की खब्त सवार हो। न देखा आयें-बायें-दायें, बस चलता रहा सीधे, न देखा पलट कर किसी को, की शायद फिर किसी से बात हुई और अपनेपन के साथ कहीं फिर साथ न छूट जाये
जमीन में फैले इस कचरे के खजाने को, जिसे रौंदते हुए अभी मेरे पाँव गुजरे हैं, जो कभी तुम्हारी इक झलक के लिये हर पल रुका करते थे, आज बेतरतीब बढ़े जा रहे हैं, की रुकना भभी चाहा तो भी रुक न पाया, इन पाँवों को भी अब ठोकर मंजूर नहीं।
सच है अरसा बीत गया आसमान को उसके अगम ऊँचाइयों के साथ देखे और अपनी शून्यता में रमी गहन गहराइयाँ नापे,
बहूत दिनों तक टहला वीरान बाज़ार में जैसे अपने को भरमा रहा हूँ, बहूत दिनों से अपने आप से भी बात नहीं की, की फीर से कहीं “मेरे” अन्दर जो “तेरा” बाकी है उस्से मुलाकात न हो जाये।
इक जूनून सा सवार है कुछ न देखने का ,
नहीं बचाया “मैं” के लिए ज़रा सा भी वक्त जबकि मेरा “मैं” मुझसे मिलकर “उसके” बारे में बतियाना चाहता है।
अकेलापन होना अलग है और अकेले, परीवेश से अपने को पृथक कर लेना अलग, एक में टूटता विश्वास होता है और एक में अपने वजूद को बचाने की ज़िद और ज़िन्दगी के कुछ अनसुलझे सवालों की कुंठा, और ये अकेले रहने की ज़िद कुछ भी करवा सकती है, एैसा मानता था मैं (जबतक)
लेकिन आज मेरी ज़िद के इतने दिनों बाद, तड़के 4 बजे दबोच लिया गया मुझे उनकी यादों के एक भगोड़े अपराधी की तरह। जबकि मैं था निहत्था, अकेला और गलती से जाग गया था इतनी सुबह, भूल गया था की उसकी याद से ही तो जागा हूँ, और इस क्षण मेरी ज़िद का सहारा भी नहीं है मेरे पास, ये मेरा कमजोर क्षण था जहाँ मैं बिलकुल अकेला और असहाय था “उनकी” याद में।
ये मेरा “वो” भाग था जो मेरे “अब” से शायद अब भी मज़बूत है अन्दर कहीं और मेरी नइ नवेली ज़िद को ठेंगा दिखा के अब भी शेष बच गया है। उस “वो” को भूलने की चाह में ये “अब” का संघर्ष है ये शायद, खैर •••
इतनी तड़के की जबकि कोई काम नहीं होता, मैं बिस्तर पर बैठा हतप्रभ सा देख रहा था कमरे की छत को, जिसमें पुराने कुछ बेहतरीन पल अपने, सिनेमा के परदे की तरह छत पर चल रहे थे, और मैं यादों के कुँए में झाँक रहा था गहराई से, शायद बहुत नीचे उतर गया है पानी, आज तो सारी डोरीयाँ कम पड़ रही हैं और अब जब जागते हुए सुबह के 6 बज रहे हैं, एैसा लगता है कि बचपन की टाफी और कुलफी वाली क्षणिक ज़िद से ज्यादा मज़बूत नहीं है मेरी ये “वो” को भूला देने की “अब” की ज़िद।
लगता है आज बहुत दिनों बाद लौट आया हूँ बाज़ार से घर।
बहुत दिनों बाद कर रहा हूँ “मैं” से बातचीत
बहुत दिनों बाद लगी है मर्मान्तक सी प्यास
आज बहुत दिनों बाद आयी है “उनकी” इतनी अधिक याद
और बहुत दिनों के बाद एहसास हुआ कि, मैं अभी बच्चा हूँ, मुझे ज़िद करना नहीं आता।
~~ अभिषेक तिवारी ‘अजेय’

और ये सिर्फ़ तुम्हारे लिए…

जो कुछ था — वह था , ‘नहीं होने’ जैसा
जो कुछ नहीं था- उस की खबर ‘होने’ से लगी
हालांकि होना कुछ अधिक ठोस था -
पर न होने ने उसका अधिकांश छिपा रखा था
और तब मैं समझा
निधन
नामक एक भयानक शब्द का असल मायना