Saturday, November 8, 2014

मैं कुछ कहूँ

मैं कुछ कहूँ,
फिर आप मेरे दिल कि बात समझे,
फिर तो बहुत देर लगेगी !
कहने सुनने कि ये बात नहीं है,
दिल कि बात है ये,
कोई काम नहीं है,
खुदा से मैं कुछ नहीं कहता,
पर वो दिल कि बात समझता है,
फिर आप क्यों नहीं समझते हैं !

मैं कुछ करूँ,
फिर आप ऐतबार करें,
फिर तो बहुत देर लगेगी !

कोई इम्तहान दे सकता हूँ,
कुछ भी हार सकता हूँ,
आपका भरोसा पा सकता हूँ,
पर वक्त जब लेगा इम्तहान,
और नाकाम हो गए हम,
फिर आप क्यों इम्तहान लेते हैं !

मैं हंस पडूँ,
और आप सब ठीक समझे,
फिर तो देर ही लगेगी !

~~merA Blog

आँखों में आँसूं थे और हाथ में एक कागज़, माँ और IAS की तैयारी

कल मेरी माँ ने फोन किया रात को बहुत हडबडाते हुए. मैंने पुछा क्या हुआ?

तो उसने कहा कि तैयारी कैसी चल रही है?

मैंने कहा बस लगे हुए हैं...बाकी तो भगवन जाने.

माँ ने बड़े मासूम भाव से कहा: भारत के प्रधानमंत्री वगेरा के बारे में तो पढ़ लिया है न?

मैंने पूछा ऐसा क्यूँ पूछ रही हो?

तो उसने कहा: अच्छा बताओ तो भारत का प्रथम प्रधानमंत्री कौन था?

मुझे हंसी आ गयी.

तो माँ ने कहा कि करोरपति में ये सवाल आया था माँ ने मुझे बताने के लिए अपनी डायरी में लिख लिया था कि कहीं मैं मिस न कर दूं ये सवाल.

मैं माँ को ये समझा न सका कि यह एक्जाम कितना बड़ा है और यह सवाल कितना छोटा.

लेकिन मैं यह समझ गया कि प्रेम और केयर योगदान नहीं भावना से नापी जाती है. 

आँखों में आँसूं थे और हाथ में एक कागज़ "The Legacy of Nehru".

Thursday, November 6, 2014

कैसे जीवन को आसान किया जाता है?

प्रेम और खुद्दारी की खींचातानी में
कैसे जीवन को आसान किया जाता है?

अश्रुधार के सम्मुख कैसे सुदृढ होकर
अपने मोती का सम्मान किया जाता है?

ताजमहल को मलबों में परिवर्तित करके
कैसे इस दिल को शमशान किया जाता है?

तिरस्कार का तीक्ष्ण हलाहल भीतर रखकर
कैसे मानव को भगवान किया जाता है?

विगत पराजय का मूल्यांकन शेष रहे तो
कैसे भविष्य का तब संधान किया जाता है?

~~ Che

Wednesday, November 5, 2014

ऐसे ही


सुबह से ही आज एक अजीब सी ख़ुशी है, वैसे तो खालीपन सा है आजकल, शायद उसके चले जाने का गम है लेकिन जब आत्मविवेचन करता  हूँ तो अपने को ही गुनहगार पता हूँ
सही भी है, उसकी यादों का  भगोड़ा अपराधी जो हूँ, कभी कभी चीज़ों का बिखर जाना अछा और सुकून देता है,  जीवन में क्या क्या पा लिया था एहसास होता है, और जब चीज़ें हाथ में रेत की तरह फिसलती हैं तो एक अजीब सी तिस होती है, 
खैर जब अपने गुनाहों का बोध होता है तो गम कुछ काम हो जाता है, सच ही है, पछतावा काफी कुछ सीखा देता है, 
पेशे से हूँ तो एक इंजीनियर लेकिन दिल से एक लेखक और कवि हूँ, सच पूछिये तो लिखना उसी को देख कर आया, अपने जीवन की जो कुछ बेहतरीन नज़्में है वो उसी के लिए लिखी हैं, आज ३ महीने होने आये कुछ नहीं लिखा, एक खली पण सा दे गयी वो, ऐसा लगता है मनो जीवन की नायिका ही मर चुकी है. 

हमेशा से कहती थी, आप अजीब और बहुत अच्छे इंसान है, माता जी भी यही कहती थी, माताजी के कहने का कभी कोई असर नहीं पड़ा लेकिन अब जब वो जा रही है, एहसास होता है की कितना अजीब हूँ, अच्छा हूँ या नहीं वो शायद वही बता पाये, 
अंतिम मुलाकात हुई दिवाली की दूसरी रोज़, ऐसा लग रहा था जैसे बस वक़्त थम जाये और महसूस करता रहूँ, कहने को तो १० मं समय लेके आई थी, लग रहा था जैसे चीज़ों से भाग रही है, लेकिन जब चीज़ें दिल से जुडी होती हैं तो उनसे भागना उतना ही मुस्किल होता है, १० मं का वो समय एक घंटे २५ मं में कब बदल गया पता ही नहीं चला,
हाँ तो मैं गुनहगार हूँ, अंतर मन में झाँका तो पाया की हूँ भी और बदल भी नहीं सकता, बस यही बताना था उसको, और यह भी की, अपने इस ऐब के अंदर भी शिद्दत से मुहब्बत की है, था मैं थोड़ा अजीब, गलतियों से भरा इंसान और उसकी एहमियत सिर्फ ये नहीं थी की मुहब्बत थी उससे बल्कि इसलिए भी थी की उसने जीवन का वो पहलु से रूबरू कराया जो शायद उसके न आने से नहीं देख पता, 

आप दुनिया में सबके सामने एक महान, बलवान आदमी हो सकते हैं लेकिन जिससे दिल के रिश्ते होते हैं उनके सामने आपको ये सब भूलना पड़ेगा, भावनाओं का भी यही है, जो महसूस करते हैं है उसको दिखने में हर्ज़ ही क्या है? आखिर भावनाएं भी उसी क लिए हैं न. 

ये तो नहीं जनता की किस्मत में क्या है, लेकिन उसके जाने से एक खलीपन सा घर कर गया है जीवन में, उसकी नादानी, बच्चों सी हरकत सब जैसे एक सिनेमा के दृश्य जैसे आँखों के सामने आज भी वही रंगीनियाँ लिए हैं, यूँ तो साल भर पुरानी बात है लेकिन मनो लगता है जैसे अभी कुछ मिनटों पहले की बात हो 

"आप मुझसे नाराज़ तो नहीं हैं न" ..... से ...... "अपना ख्याल रखियेगा"  तक का सफर सचमुच बहुत ही डरावना है और लगता है जैसे मैं आज भी बच्चों से ज़िद और बच्चों सा डरता हूँ :) 

~~ अजेय 

मैं, तुम और हम

26 मई की कुछ भूली बिसरी याद 


जीवन से लड़ते-लड़ते
बीत चुके हैं कई दिन महीने साल
जीवन के इस कुरक्षेत्र में लड़ते लड़ते
खत्म हो चुके हैं मेरे तरकश के तीर
टूट चुकी है मेरी तलवार
टूट चूका है कवच
अपना अंतिम प्रहार भी कर चूका मैं
नयनो से अश्रु और देह से रक्त की धार निकल रही है
,अभिमन्यु की मानिंद उठा लिया है पहिया
इस समर का चक्रव्यूह भेदने
और अंजाम सोचे बिना कूद पड़ा हूँ रण में
इन सबके बीच सोचता हूँ की
कहाँ है वो कृष्ण जिसने मुझे
बिना कुछ सोचे समझे युद्ध में कूद जाने की सलाह दी थी
आत्मविवेचन किया तो पाया की कोई कृष्ण
तो था ही नहीं वो बस “मैं” और “तुम” को “हम” बनाने की चाह में
सबकुछ हारता हुआ देख रहा हूँ
और बारिश में सिगरेट हाथ में लिए
शून्यता में रमे आकाश को निहारते हुए
मैं खोजता हूँ खुद को
अकेले इस जीवन को
अपने समूचे अस्तित्व को खोते हुए
तुम्हारे बिना जीते हुए
~~ अभिषेक तिवारी ‘ अजेय ‘

कब वो जाहिर होगा

(उसके लिए जो कभी कुछ नहीं कहती ☺)


कब वो जाहिर होगा और हैरान करेगा मुझे
सारी मुश्किलों से आजाद कर देगा मुझे
जान फुकेगा वो मुहब्बत के जिस्म में मेरे
अपने सामने बेजान कर देगा मुझे
एक नामौजूदगी रह जायेगी चारों तरफ
घीरे घीरे इस कदर सुनसान कर देगा मुझे
बिन कुछ कहे सब कह जायेगा
इस तरह बे पीर कर जायेगा मुझे
छूट जायेंगी उसकी यादों की चाकरी मुझसे
किसी दिन अफ़सर-ए-खास कर जायेगा मुझे
खिलेंगे तब मुहब्बत के फूल गुलशन में
देखते ही देखते वीरान कर जायेगा मुझे
पीर = आवाज़
चाकरी = नौकर जैसे काम करना
~~ अभिषेक तिवारी ‘अजेय’

जीवन को एक नया आयाम देती हो तुम....

अंधकार में जैसे जला हो कोई दीपक
और उसके इर्द गिर्द करवट बदलता अँधेरा
अपने नए अस्तित्व को पहचानता
अपना सर्वस्व त्याग कर
एक नयी अनुभूति करता
वैसे ही है तुम्हारे बाँहों का घेरा
जिसके दायरे में आके मुस्कुरा उठता है
दुनिया में सबसे उदास जीवन मेरा
नए आयाम मिलते हैं जीवन को मेरे
लगता है जैसे दुःख, दुःख नहीं रहे अब मेरे
एक नया एहसास कराती हो तुम
तुमने नहीं जाना, सहसा मुझमे कितनी उत्तर गयी हो तुम
कोई सुन्दर सा अभिशाप जैसे वर लिया
हाँ !! सच है
मेरे जीवन को है तुमने एक नया नाम दिया
ये कलम, जो पहले शांत थी
इसको पकड़ कर अब लिखना भी सिख लिया
हर पल एक नया एहसास कराती हो तुम
मुझमे एक नव चेतना जागती हो तुम
~~ अभिषेक तिवारी ‘ अजेय ‘